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राहुल गांधी का एजेण्डा...सब राहुल बाबा का चमत्कार है |
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यूपीए को 262 सीटें मिल जाएंगी इस की कल्पना तो खुद कांग्रेस ने भी नहीं की होगी। अब सवाल उठता है कि आखिर ये चमत्कार क्यों हो गया। कहा जा रहा है कि ये सब राहुल बाबा का चमत्कार है। देखिये यूपी में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया और वहां पार्टी को 1991 के बाद सबसे ज्यादा सीटें मिली। 21 सीटें और पिछले विधान सभा चुनावों के मुकाबले दस फीसदी से ज्यादा बढ़ा हुआ वोट। राहुल का कहना है कि वो काग्रेंस संगठन को मजबूत करना चाहते हैं। लेकिन उनपर दबाव पड़ रहा है कि वो कैबिनेट में शामिल हो जाएं। राहुल कैबिनेट में शामिल होंगे या नहीं ये तो पता नहीं लेकिन यू पी ए की पहली बैठक में शरीक होकर ये संकेत जरुर दे दिया कि वो भले ही सरकार में शामिल नही हों लेकिन वो परोक्ष रुप से उसमें दखल देते रहेंगे। राहुल ने चुनावी सभाओं में हमेशा कहा कि दिल्ली से चला एक रुपया गांवों तक पहुंचते पहुंचते दस पैसे में तब्दील हो जाता है लेकिन अब राहुल सिर्फ ये कहकर अपनी जिम्मेदारी से बच नही सकते। उनसे देश अब बाकी के 90 पैसों का हिसाब मांगेंगा। जाहिर है कि राहुल अब ग्रामीण विकास विभाग। कृषि जैसे विभागों पर उनके कामकाज पर खास नजरे रखेंगे। नरेगा यानि ग्रामीण रोजगार गांरटी योजना का नाम राहुल जपते रहे है। यहां तक कि राहुल ने नरेगा के मजदूरों के साथ राजस्थान में मजदूरी की थी और जबलपुर में नरेगा के तहत मजदूरी मांग रहे लोगों के साथ धरने पर ही बैठ गये थे। अब राहुल को देखना पड़ेगा कि ये योजना ठीक ढंग से चले, इसमें भ्रष्टाचार कम से कम हो और असली मजदूरों किसानों को ही इसका लाभ मिले। राहुल गाधी के लिए ये एक बड़ी चुनोति होगी। इसलिए ही कहा ये भी जा रहा है कि राहुल अगर मंत्री बनने को तैयार हुए तो ग्रामीण विकास का ही मंत्रालय लेना पसंद करेंगे। राहुल गांधी ने पिछली मनमोहनसिंह की सरकार में अपनी ब्रिगेड के युवाओं को मंत्री बनवाया था अब वो चाहेंगे कि ज्यादा से ज्यादा युवा चेहरे मनमोहन सरकार का हिस्सा बन सकें। इस बार कांग्रेस के पास धड़ों में बांटने के लिए सीमित ही मंत्रालय है लिहाजा इस बार युवा चेहरों की संख्या बढ़ी तो किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए। युवा चेहरों का काम काज भी राहुल की पैनी नजरों के आगे होगा। कहीं ऐसा न हो कि ये चेहरे सरकार के साथ साथ राहुल गांधी का नाम ही न डुबो दे लिहाजा राहुल का वार रुम शायद अब नई भूमिका में नजर आएगा। राहुल ने यू पी और बिहार में एकला चलो रे की नीति अपनाई थी। इसका लाभ पार्टी को यू पी में हुआ लेकिन ये काम अभी शुरु ही हुआ है। अगले कुछ महीनों में महाराष्ट में विधान सभा चुनाव होने है। कांग्रेस का एक ध़ड़ा अभी से कह रहा है कि शरद पंवार की एन सी पी का साथ अब पार्टी को छोड़ देना चाहिए। राहुल को ये फैसला जल्दी ही लेना पड़ सकता है। इसके बाद अगले साल के अंत में बिहार में होने वाले चुनाव असली अग्नि परीक्षा साबित होंगे। कुल मिलाकर अभी तक राहुल गांधी ने जितने दांव खेले उसमें वे सफल हुए हैं लेकिन हमेशा इतने ही खुशनसीब वो निकले ये कतई जरुरी नहीं है। ऐसे में राहुल गांधी को बुरे वक्त के लिए भी तैयार रहना चाहिए। प्लान बी भी अपने पास रखना चाहिएय़।
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