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विकास पर ना बात पर, मोहर लगेगी जात पर... आजादी के 60 साल हो गए. क्या हम आजाद हैं ? |
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- Author : Deepak Chaurasia
आजादी के 60 साल हो गए. क्या हम आजाद हैं ? क्या हमने धार्मिक और जातिगत मानसिकता की बेड़ियां तोड़ दी हैं ? दुनिया के सामने हम आजाद हैं लेकिन हमारी सोच में हम अब भी गुलाम हैं. यह मैं नहीं कह रहा हूं, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का विश्लेषक बोल रहा है. राजनीतिक पत्रकारिता में 1993 में बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने के बाद यूपी चुनाव के वक्त किसी नेता ने मुझे कहा, “In this country people don’t caste their vote, they vote their caste”. यानी जनता अपना वोट सिर्फ जातिगत समीकरणों को आगे रखकर देती है. दुर्भाग्य ये है कि आजादी के साठ साल बाद ये चलन बढ़ता ही जा रहा है. राजनीति के बुद्धिजीवी इसे सोशल इंजीनियरिंग का नाम दे देते हैं. लेकिन माफ कीजिएगा ये गद्दी पर पहुंचने के लिए जातिगत समीकरणों को फिट और हिट करने से ज्यादा कुछ नहीं है. आइए, कुछ उदाहरण और नजीरें पेश कर देता हूं आपके सामने. हाल ही के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव तो याद होंगे. मायावती ने ब्राह्मण-दलित वोट बैंक की ऐसी सामाजिक समरसता फैलाई की हाथी ने साइकिल को पंक्चर कर दिया, कमल को कुचल दिया और हाथ को साफ कर दिया. बीस साल पहले बीएसपी का स्लोगन था, तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार. उस नारे ने काम किया और कांशीराम ने मेहनत करके कम से कम उत्तर प्रदेश यानी देश के सबसे बड़े सूबे में दलित वोट बैंक को अपना बना लिया. लेकिन मायावती को पहली बार मुख्यमंत्री बनने के लिए कुछ दलों से हाथ मिलाना पड़ा तो ये नारा बदल गया. तिलक को साफ किया, तराजू को हाफ किया और तलवार को माफ किया. लेकिन मायावती को पता था कि पूरा यूपी फतह करने के लिए एक जाति की और जरूरत होगी इसलिए उन्होंने पिछले चुनाव में दलित-ब्राह्मण गठबंधन बनाया. नया नारा दिया गया, हाथी नहीं गणेश हैं, ब्रह्मा-विष्णु-महेश हैं. लेकिन यहां पर सिर्फ बीएसपी को ही जातिगत राजनीति के फैलाव के लिए क्यों दोषी ठहराया जाए. चाहे कांग्रेस हो या बीजेपी, टिकट देते वक्त हर राजनीतिक पार्टी प्रत्याशी की जात, पात, धर्म और क्षेत्र में उनके वोटों की संख्या का आकलन पहले ही कर लेती है. ये बात सच है कि गठबंधन सरकारों के दौर में ऐसी पार्टियों को और अधिक महत्व मिलने लगा है. मायावती हर काम बहुजन समाज और सर्व समाज के हित में करती हैं चाहे वो सरकार बनाती हों या गिराती हों. यही हाल कमोबेश राष्ट्रीय पार्टियों का है. हालात तो यहां तक है कि अपना दल जैसी पार्टियां बन रही हैं जो सिर्फ कुर्मी वोट बैंक पर टिकी हैं. सच बात यह है कि कांग्रेस और बीजेपी के कमजोर होने के पीछे उनके जातिगत समीकरणों का पूरी तरह से बिखड़ जाना है. बाबरी मस्जिद के बाद मुस्लिम कांग्रेस से दूर हो गए तो कांशीराम पहले से ही दलितों को अपने साथ कर चुके थे. ब्राह्मण, बनियों और ठाकुरों को बीजेपी लूट चुकी थी. लेकिन इन ब्राह्मणों पर सेंधमारी कर बीएसपी ने उत्तर प्रदेश में बीजेपी के वजूद पर ही सवालिया निशान लगा दिया. जब बात यूपी की कर रहे हैं कि ये भी समझ लेना जरूरी है कि मौलाना मुलायम सिंह का दिल क्यों हिंदुत्व की पताका फहराने वाले कल्याण सिंह पर आ गया है. दरअसल, मुलायम की फिक्र उन दस सीटों को लेकर है जहां पर लोध वोट यानी कल्याण सिंह की जाति का वोट खासी संख्या में है. इन सीटों पर अगर लोध वोट उन्हें अगर मिल जाता है तो मुलायम की साइकिल की टायर का पंक्चर लग जाएगा. दक्षिण में तो वैसे ही पेरियार के समय से शुरू हुई सियासत ने वोट को जाति के आधार पर बांट दिया था. लेकिन अब फिल्मों के सुपर स्टार भी जाति आधारित पार्टी बना रहे हैं. तेलगु फिल्मों के सुपरस्टार रहे चिरंजीवी ने प्रजाराज्यम पार्टी बनाई. चिरंजीवी कापू वोट बैंक के आधार पर राज्य की राजनीति में छा जाना चाहते हैं जिसकी आबादी राज्य में करीब 30 फीसदी है. ये सच है कि मैं इस बार जाति के आधार पर बनी सबसे नई पार्टी का जिक्र करके अपनी बात खत्म करूंगा. लेकिन लगभग 40 फीसदी वोटरों में शामिल 18 से 40 वर्ष उम्र के नौजवानों को ये बताना भी चाहूंगा कि क्यों न इस बार हम जन-मन की बात करें. जाति और मजहब की नहीं. क्यों न यहां से एक बहस की शुरुआत करें कि हम वोट जाति को आधार बनाकर नहीं देंगे. क्यों न ये संकल्प लें कि हम भावनात्मक भुलावे में न आकर रचनात्मक प्रजातंत्र की ओर पहल करें. क्यों न हम एक मजबूर नहीं, मजबूत सरकार दें. और जिस दिन वोटरों का ये नजरिया राजनीतिक दलों तक पहुंचेगा तो मुझे पूरी उम्मीद है कि उनका एजेंडा भी बदल जाएगा. लेकिन जाते-जाते मैं आपको ये जरूर बताउंगा कि अगले पोस्ट में मैं ये बताउंगा कि कैसे हर राजनीतिक पार्टी ने जाति और धर्म की सियासत की और आखिरकार क्षेत्रीय पार्टियों का उदय कैसे हुआ. जाति के आधार पर वोट न करने के इस अभियान में आप अपनी सलाह, प्रतिक्रिया और अपने सुझाव जरूर दें. लोकतंत्र में सबको अपनी बात रखने का अधिकार है और अधिकार का उपयोग करना हरेक जिम्मेदार नागरिक की जवाबदेही है.
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