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रिपोर्टर डायरी
जयाप्रदा का गोदान
Reporter :
पंकज झा
आजम खां और अमर सिंह की जंग में पिस रहीं रामपुर से समाजवादी पार्टी की प्रत्याशी जयाप्रदा ने किया है गोदान। गोदान एक ऐसी धार्मिक रीति जिसे भारतीय समाज में सबसे बड़ा पुण्य माना जाता है और तमाम संकट हरने वाला भी कहा जाता है तो लगता है कि आजम के महासंकट से बचने के लिए जयाप्रदा ने कर दिया है गोदान।
उत्तरप्रदेश के रामपुर लोकसभा क्षेत्र में लिखा गया है एक नया सियासी उपन्यास जिसका नाम है गोदान। नया इस लिए क्योंकि उन्नीस सौ छत्तीस में रामपुर से सटे उत्तरप्रदेश के अवध क्षेत्र के सेमरी और बेलारी गांवों की पृष्ठभूमि पर होरी को केन्द्र में रख हिंदी के महान रचनाकार प्रेमचंद ने लिया था एक महान उपन्यास गोदान। प्रेमचंद का उपन्यास किसान की त्रासदी दिखाता है तो जयाप्रदा का गोदान भारतीय सियासत की। इन नए सियासी गोदान में आजम खां की राजनीतिक अदावत से जूझती फिल्म अभिनेत्री जयाप्रदा ने किया अपने सियासी संकट को खत्म करने के लिए गोदान।अपनी चुनावी जीत के लिए गोदान।वैसे तो युद्धक्षेत्र में होता है अश्वमेध लेकिन जयाप्रदा ने किया है गोदान।
भारतीय समाज में गोदान जन्म से मृत्य तक हर उस मौके पर किया जाता है।जिसे शुभ या महत्व का माना जाता है।
तिहत्तर साल पहले प्रेमचंद्र ने अवध क्षेत्र की व्यथा अपने उपन्यास में दिखाई थी होरी के जरिए। जिसमें ब्रम्हाणवादी जातीय व्यवस्था के खिलाफ होरी लड़ता है अपनी गरीबी और तंगहाली के बावजूद पर जयाप्रदा का गोदान युद्ध में योद्धा के समर्पण की कहानी कहता है।
रामपुर में जयाप्रदा की जीत आजम खां और अमर सिंह की अदावत के बीच पिस रही है। नारे लग रहे हैं कि आजम खां कि बात पर मोहर लगेगी हाथ पर यानि बागी आजम खां ने जयाप्रदा को हराने के लिए कांग्रेसी प्रत्याशी नूरबानों के पक्ष में खुद को झुका दिया है। जयाप्रदा और अमर सिंह इस सियासी दंगल से बुरी तरह परेशान हैं। अमर सिंह ने तो यहां तक कह दिया कि अगर जयाप्रदा हारती हैं तो समाजवादी पार्टी हारेगी।
प्रेमचंद के होरी का गोदान उपन्यास का क्लाईमेक्स है पर जयाप्रदा का गोदान उनके सियासी झगड़े का क्लाईमेक्स नहीं बल्कि एंटी क्लाईमेक्स है। होना तो ये था कि अमर सिंह के दबाव में आकर मुलायम सिहं आजम खां को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा देते और जंग खत्म हो जाती, जया की जीत का रास्ता साफ होता पर तमाम आरोपों और जवाबों के बावजूद आजम थामे नहीं थमे और जयाप्रदा के मुश्किल हालत उन्हें गोदान तक ले आए।
ये गोदान जयाप्रदा की हताशा का दस्तावेज है। एक जनप्रतिनिधि के अंधविश्वास की कहानी है। जो अपने पीछे चल रही समाजवादी पार्टी के दो दिग्गजों की जंग से बुरी तरह परेशान है।
शायद किसी ने जयाप्रदा को आजम खां की मुसीबत से बचने के लिए गोदान की सलाह दी जो कि सबसे बड़े दान में से एक माना जाता है और जीवन के कष्टों की वैतरणी गाय की पूछ पकड़ कर पार करवा देता है। लोकतंत्र में जनता की उम्मीदों को परवान चढ़ाने वाले नेता ने अपने विरोधियों के हमले से बचने के लिए गाय की पूछ पकड़ ली है। जबकि प्रेमचंद्र का नायक होरी अपने विरोधियों से हर हाल में लड़ते हुए मृत्युशय्या पर गाय की पूछ पकड़ता है। प्रेमचंद्र के उपन्यास में सामाजिक विसंगतियों से लड़ता हुआ नायक होरी भले ही उसी जातिव्यस्था के तानेबाने में अपनी मुक्ति के लिए गोदान करता है पर वो होरी की जीत थी क्योंकि वो भारतीय समाज को सोचने पर आज भी मजबूर करती है जबकि जयाप्रदा का गोदान परिस्थितियों के सामने घुटने टेकना है क्योंकि हर तरह से सक्षम जयाप्रदा अपनी मुश्किलों से निकलने के लिए एक अंधविश्वास का सहारा लेती हैं। इस तरह से प्रेमचंद्र का होरी हार के भी जीत जाता है जबकि जयाप्रदा अगर जीत भी जाती हैं तो उन्हें हारा हुआ ही माना जाएगा।
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